
एक और साल बीत गया. कैलेंडर बदलेगा, तारीख़ें नई होंगी, लेकिन सवाल यह है—क्या सोच भी बदलेगी? बीता हुआ साल विदा ले रहा है, मगर पीछे छोड़ गया है ऐसे कई सवाल, जिनसे मुँह मोड़कर नया साल शुरू करना आत्मघात होगा. यह लेख जश्न का नहीं, आत्ममंथन का है; बधाइयों का नहीं, दिशा-निर्देश का है.साल जा रहा है। टीवी स्क्रीन पर अब चमकदार ग्राफिक्स चलने शुरू हो गया है .गुडबाय 2025, वेलकम 2026. एंकर मुस्कुरा रहे हैं, आतिशबाज़ी हो रही है, सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की बाढ़ है. लेकिन ज़रा रुकिए. क्या वाक़ई साल बदलने से हालात बदल जाते हैं? या हम हर साल की तरह इस बार भी सवालों को पुराने साल के साथ दफ़ना देने वाले हैं? बीता हुआ साल जब विदा ले रहा है, तो वह सिर्फ़ 365 दिन नहीं ले जा रहा.वह अपने साथ हमारी भूलें, हमारी चुप्पियाँ और हमारी सुविधाजनक सहमतियाँ भी लेकर जा रहा है. सवाल यह है कि क्या हम उसे जाने देंगे, या अगले साल भी वही बोझ ढोते रहेंगे? बीते साल में दुनिया ने फिर देखा कि युद्ध अब भी खबरों का स्थायी कंटेंट हैं.बम गिरते रहे, बच्चे मरते रहे, शहर उजड़ते रहे.हर बार कहा गया—स्थिति जटिल है. लेकिन जटिलता का बोझ हमेशा आम लोगों के कंधों पर क्यों आता है? सत्ता सुरक्षित रहती है, बयान सुरक्षित रहते हैं, सिर्फ़ इंसान असुरक्षित होता है.बीता साल यह सवाल छोड़ गया कि क्या इंसानियत अब सिर्फ़ भाषणों तक सीमित रह गई है?
देश की तरफ़ लौटिए. यहाँ विकास के आंकड़े थे, लेकिन बेचैनी भी थी. कहा गया कि अर्थव्यवस्था मज़बूत है, लेकिन घरों में चर्चा महंगाई की थी.कहा गया कि रोज़गार के अवसर बढ़ रहे हैं, लेकिन युवाओं की आँखों में इंतज़ार था. सवाल पूछने वालों को बार-बार समझाया गया कि सब्र रखिए. मगर क्या सब्र सिर्फ़ जनता के लिए होता है?लोकतंत्र के लिए बीता साल आसान नहीं था.सवाल पूछने की आवाज़ को कई बार शोर कहा गया. असहमति को अवरोध और आलोचना को नकारात्मकता बताया गया. सोशल मीडिया पर ट्रेंड चला—सब ठीक है. लेकिन ज़मीनी हकीकत ने बार-बार बताया कि सब ठीक नहीं होता, सब ठीक दिखाया जाता है. और जब दिखावे और सच्चाई के बीच फासला बढ़ता है, तब लोकतंत्र थकने लगता है.बीते साल की एक बड़ी भूल यह रही कि सच सबसे असुविधाजनक चीज़ बन गया. अफ़वाहें वायरल होती रहीं, तथ्य सफ़ाई देते रहे. किसी वीडियो से पूरा सच तय हो गया, किसी पोस्ट से पूरा इंसान. भीड़ ने तय किया कि कौन सही है और कौन ग़लत. अदालतें थीं, संस्थाएँ थीं, लेकिन फैसला अक्सर पहले ही हो चुका था. बीता साल हमें चेतावनी देकर गया कि जब सच को टाइम नहीं मिलता, तो नफ़रत को पूरा मंच मिल जाता है.अर्थव्यवस्था की बात करें तो ग्रोथ की रफ्तार पर बहस हुई, लेकिन उस किसान की बात कम हुई जिसकी फसल सही दाम नहीं पाई. उस मज़दूर की बात कम हुई, जिसके हाथ में काम कम और महंगाई ज़्यादा थी.छोटे व्यापारियों ने साल गुज़ारा, लेकिन भरोसे के सहारे. बीता साल कहकर गया कि अगर विकास की कहानी में आख़िरी आदमी ग़ायब है, तो वह कहानी अधूरी है.अब नया साल आ रहा है.वह कोई मसीहा नहीं है. वह कोई जादुई समाधान नहीं लाया है. वह सिर्फ़ एक मौका लेकर आ रहा है—खुद से ईमानदार होने का. सवाल पूछने से डर न लगने का. यह मानने का कि हर आलोचक दुश्मन नहीं होता और हर असहज सवाल देशद्रोह नहीं होता.नए साल के लिए दिशा साफ़ होनी चाहिए.नीतियाँ बनें, लेकिन संवेदना के साथ.आंकड़े आएँ, लेकिन इंसान के साथ.ताक़त हो, लेकिन जवाबदेही के साथ.और सबसे ज़रूरी—सच हो, बिना डर के.
बीते साल को विदा करते हुए यह कहना ज़रूरी है कि गलतियाँ होना समस्या नहीं है, उनसे न सीखना समस्या है. अगर नया साल भी वही सवाल, वही चुप्पी और वही बहाने लेकर आया, तो फर्क सिर्फ़ तारीख़ का होगा, हालात का नहीं.साल बदला है.अब सोच बदलनी होगी.वरना अगले साल भी हम यही लिख रहे होंगे कि साल बदला है,सवाल वही हैं.



