
बिहार की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में एक अजीब और चिंताजनक सच्चाई सामने खड़ी है. राज्य का शायद ही कोई ऐसा जिला बचा हो जहाँ सरकारी अस्पतालों या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आयुष चिकित्सक तैनात न हों. आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी के डॉक्टर हर जिले में मौजूद हैं, कुर्सी पर बैठते हैं, ओपीडी करते हैं, मरीजों को देखते हैं लेकिन इलाज के नाम पर उनके पास अपनी पद्धति की दवाइयाँ नहीं हैं.यह स्थिति केवल विडंबना नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता और प्रशासनिक लापरवाही का खुला प्रमाण है.आंकड़े कहते हैं तैनाती पूरी, व्यवस्था अधूरी राज्य सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि हाल के वर्षों में 1,283 नए आयुष चिकित्सकों की नियुक्ति की गई है, जिनमें 685 आयुर्वेद चिकित्सक शामिल हैं. इससे पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 2,600 से अधिक आयुष डॉक्टर संविदा पर पहले से कार्यरत थे.बिहार के 38 के 38 जिलों, सैकड़ों प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, अनुमंडलीय अस्पतालों और लगभग सभी सदर अस्पतालों में आयुष डॉक्टर मौजूद हैं.मतलब साफ है कि
डॉक्टरों की कमी नहीं है, ढांचे की कमी नहीं है,नीति की घोषणाओं की भी कमी नहीं है.तो फिर सवाल उठता है
जब डॉक्टर हर जगह हैं, तो आयुष इलाज क्यों नहीं मिल रहा?क्योंकि दवा नहीं है.हकीकत यह है कि पिछले कई वर्षों से सरकारी अस्पतालों में आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक दवाओं की नियमित आपूर्ति नहीं हो रही. कई जिलों में आयुष चिकित्सक यह कहने को मजबूर हैं कि कई साल तक दवाओं का स्टॉक नहीं आया.स्वास्थ्य विभाग की फाइलों में वजहें दर्ज हैं कभी टेंडर प्रक्रिया अटकी,कभी बिडिंग नहीं खुली,कभी सप्लायर तय नहीं हो पाया.बताया जाता है कि 280 से अधिक आयुष दवाओं की खरीद प्रक्रिया लंबे समय तक लंबित रही, जिसका सीधा असर अस्पतालों की अलमारियों पर पड़ा. अलमारियाँ खाली रहीं और डॉक्टर लाचार.मजबूरी में आयुष डॉक्टरों को एलोपैथिक यानी अंग्रेज़ी दवाएँ लिखनी पड़ रही हैं.यह न केवल चिकित्सा नियमों के खिलाफ है, बल्कि पूरी आयुष व्यवस्था को ही बेमानी बना देता है.यह वही स्थिति है जैसे -स्कूल में शिक्षक हों, पर किताबें न हों.थाने में पुलिस हो,पर हथियार न हों.
अस्पताल में डॉक्टर हो,पर दवा न हो.ऐसी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है.इस अव्यवस्था की सबसे बड़ी कीमत मरीज चुका रहा है.जो मरीज आयुर्वेदिक इलाज के भरोसे सरकारी अस्पताल पहुंचता है, उसे या तो अंग्रेज़ी दवा मिलती है या फिर निजी आयुर्वेदिक क्लिनिक का रास्ता पकड़ना पड़ता है. गरीब और ग्रामीण मरीज के लिए यह सीधा नुकसान है.साथ ही आयुष चिकित्सा के प्रति लोगों का भरोसा भी टूट रहा है.जब सरकारी अस्पताल में बैठा आयुष डॉक्टर खुद कहे कि “दवा नहीं है”तो मरीज क्या सोचेगा?नीति के दावे और ज़मीनी हकीकत सरकार योग दिवस मनाती है, आयुष को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े दावे करती है, पोस्टर लगते हैं,कार्यक्रम होते हैं, नियुक्ति पत्र बांटे जाते हैं, लेकिन अस्पताल की ज़मीन पर आकर यह पूरी नीति खोखली साबित होती है.आयुष डॉक्टर की पहचान उसकी दवा से होती है.जब वही दवा नहीं होगी, तो नियुक्ति सिर्फ़ आंकड़ों की खानापूर्ति बनकर रह जाती है.सीधे सवाल, जिनके जवाब ज़रूरी हैं.जब हर जिले में आयुष डॉक्टर तैनात हैं, तो दवा क्यों नहीं?दवा आपूर्ति में वर्षों की देरी की जिम्मेदारी किसकी है?बिना दवा डॉक्टर बैठाकर सरकार आखिर साबित क्या करना चाहती है?क्या आयुष सिर्फ़ कार्यक्रमों और भाषणों तक सीमित रहेगा?अब भी वक्त है सुधार का अगर सरकार सच में आयुष को मजबूत करना चाहती है, तो उसे – दवाओं की नियमित और अनिवार्य आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी,अलग और सुरक्षित बजट व्यवस्था बनानी होगी, दवा आपूर्ति में लापरवाही पर जवाबदेही तय करनी होगी. आयुष डॉक्टरों को उनकी पद्धति से इलाज करने का अधिकार देना होगा
जब तक यह नहीं होगा, बिहार में आयुष चिकित्सा इलाज नहीं, मजबूरी बनकर चलती रहेगी.डॉक्टरों की मौजूदगी से व्यवस्था नहीं चलती,दवा और इच्छाशक्ति से चलती है.




