
ग्रामीण भारत के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) केवल एक योजना नहीं, बल्कि करोड़ों गरीब परिवारों के लिए जीवनयापन का सहारा रहा है। इस कानून का मूल उद्देश्य था—हर ग्रामीण परिवार को साल में कम से कम 100 दिन का सुनिश्चित रोजगार और समय पर मजदूरी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह योजना लगातार कमजोर होती जा रही है। काम के दिन घटे हैं, मजदूरी भुगतान में देरी आम बात हो गई है और मजदूरों का भरोसा डगमगाने लगा है। ऐसे समय में सरकार द्वारा ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी वीबी–जी राम जी के तहत 125 दिनों के रोजगार का वादा किया गया है। सुनने में यह घोषणा आकर्षक लगती है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे मेल नहीं खाती। जब मौजूदा कानून के तहत 100 दिन की गारंटी ही पूरी नहीं हो पा रही, तो 125 दिन के नए वादे पर विश्वास कैसे किया जाए?
सबसे बड़ा सवाल वित्तीय व्यवस्था को लेकर है। नए प्रस्ताव में रोजगार के दिनों को बढ़ाने के साथ-साथ खर्च का 40 प्रतिशत भार राज्य सरकारों पर डाल दिया गया है। पहले से ही कर्ज और आर्थिक दबाव से जूझ रही राज्य सरकारों के लिए यह बोझ उठाना बेहद कठिन होगा। इसका सीधा असर मजदूरों पर पड़ेगा—या तो काम के अवसर घटेंगे या फिर मजदूरी भुगतान में और देरी होगी।इस बिल की एक और चिंताजनक बात यह है कि मजदूरी देने या न देने का निर्णय केंद्र सरकार के विवेक पर छोड़ने की व्यवस्था की जा रही है। इससे मनरेगा की आत्मा—गारंटीड रोजगार का अधिकार—खतरे में पड़ जाता है। यदि यह अधिकार पंचायतों और राज्यों से निकलकर केंद्र के हाथ में चला जाता है, तो योजना का उपयोग कल्याण के बजाय राजनीतिक दबाव के औजार के रूप में होने की आशंका बढ़ जाती है। पश्चिम बंगाल में पिछले कई वर्षों से मनरेगा के तहत काम और भुगतान ठप रहना इस खतरे का स्पष्ट उदाहरण है।विपक्ष का आरोप है कि मनरेगा का नाम बदलकर और 125 दिन का शोर मचाकर सरकार इस ऐतिहासिक योजना को धीरे-धीरे अप्रासंगिक बनाने की कोशिश कर रही है। महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी योजना को भगवान राम के नाम से जोड़ना राजनीतिक रूप से लाभकारी हो सकता है, लेकिन इससे योजना के मूल उद्देश्य—गरीबों को सम्मानजनक रोजगार—पर सवाल खड़े होते हैं। धर्म और आस्था को रोजगार जैसी बुनियादी जरूरत से जोड़ना न तो व्यावहारिक है और न ही उचित।आज जरूरत नई घोषणाओं की नहीं, बल्कि मौजूदा कानून को ईमानदारी से लागू करने की है। सभी पंजीकृत मजदूरों को अनिवार्य रूप से 100 दिन का काम मिले, मजदूरी समय पर मिले और इसके लिए केंद्र सरकार पर्याप्त बजट बिना किसी भेदभाव के जारी करे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किए बिना ‘विकसित भारत’ का सपना अधूरा ही रहेगा।125 दिन का वादा अगर केवल कागजों तक सीमित रह गया, तो यह ग्रामीण मजदूरों के साथ एक और विश्वासघात होगा। सरकार को चाहिए कि वह शोरगुल और प्रतीकों से आगे बढ़कर जमीनी हकीकत पर ध्यान दे, तभी महात्मा गांधी के ग्राम-स्वराज और सच्चे विकास की कल्पना साकार हो सकती है।




