
23 दिसंबर—राष्ट्रीय किसान दिवस। यह दिन देश के पूर्व प्रधानमंत्री और किसानों के हितों की आवाज़ रहे चौधरी चरण सिंह की जयंती के रूप में मनाया जाता है। हर साल इस दिन मंच सजते हैं, भाषण होते हैं, किसान को ‘अन्नदाता’ कहा जाता है। लेकिन सवाल वही पुराना है—क्या किसान केवल भाषणों और नारों तक सीमित रह गया है?
भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ आज भी खेती है। देश की लगभग 45 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। फिर भी यही किसान सबसे ज्यादा कर्ज़ में डूबा है, सबसे ज्यादा असुरक्षित है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि औसतन एक किसान परिवार की मासिक आय सीमित है, जबकि खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है—बीज, खाद, डीज़ल, बिजली, मजदूरी सब महंगे, लेकिन फसल का दाम वही पुराना या उससे भी कम। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की बात हर चुनाव में होती है, लेकिन ज़मीन पर हकीकत अलग है। अधिकांश किसान आज भी अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर हैं। मंडियों में बिचौलियों का बोलबाला है और सरकारी खरीद सीमित। जिन योजनाओं की घोषणा होती है, उनका लाभ अक्सर कागजों में सिमट कर रह जाता है।सबसे चिंताजनक तस्वीर किसानों की आत्महत्या से जुड़ी है। सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाएँ, फसल बीमा की जटिल प्रक्रियाएँ और समय पर मुआवज़ा न मिलना—ये सब मिलकर किसान को तोड़ देते हैं। जलवायु परिवर्तन ने खेती को और अनिश्चित बना दिया है, लेकिन इसके अनुरूप नीतियाँ और ज़मीनी तैयारी नदारद है।
युवा पीढ़ी तेजी से खेती से दूर हो रही है। गांव से शहर की ओर पलायन बढ़ रहा है, क्योंकि खेती में सम्मान और स्थिर आय दोनों की कमी है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले वर्षों में देश की खाद्य सुरक्षा भी सवालों के घेरे में होगी।
राष्ट्रीय किसान दिवस केवल श्रद्धांजलि या औपचारिक कार्यक्रमों का दिन नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का दिन होना चाहिए—कि क्या हमारी नीतियाँ सचमुच किसान के पक्ष में हैं? क्या उसे उसकी मेहनत का वाजिब दाम मिल रहा है? क्या खेती को लाभ का पेशा बनाने की ईमानदार कोशिश हो रही है?किसान को सिर्फ “अन्नदाता” कहने से काम नहीं चलेगा। उसे सम्मान, सुरक्षा और स्थायी आय चाहिए। जब तक खेत में पसीना बहाने वाले के जीवन में खुशहाली नहीं आएगी, तब तक राष्ट्रीय किसान दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख बनकर रह जाएगा।



