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संविधान, संवेदनशीलता और सत्ता की मर्यादा

बिहार की राजनीति इन दिनों एक ऐसे प्रकरण को लेकर गरमाई हुई है, जिसने सत्ता, संवैधानिक मर्यादा और सामाजिक संवेदनशीलता—तीनों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

बिहार की राजनीति इन दिनों एक ऐसे प्रकरण को लेकर गरमाई हुई है, जिसने सत्ता, संवैधानिक मर्यादा और सामाजिक संवेदनशीलता—तीनों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा आयुष डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र सौंपने के दौरान एक महिला डॉक्टर का हिजाब खींचने की घटना अब महज एक व्यक्तिगत व्यवहार का मामला नहीं रही, बल्कि यह महिला सम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा राष्ट्रीय विमर्श बन चुकी है।यह घटना उस समय और अधिक संवेदनशील हो जाती है, जब यह समझा जाए कि मंच पर खड़ी महिला कोई आम नागरिक नहीं, बल्कि राज्य की सेवा में चयनित एक डॉक्टर थी। नियुक्ति पत्र का वह क्षण किसी भी युवा के जीवन का गौरवपूर्ण पल होता है। ऐसे में उस पल को असहज, अपमानजनक और विवादास्पद बना देना न केवल व्यक्तिगत संवेदनशीलता की कमी दर्शाता है, बल्कि सत्ता के आचरण पर भी सवाल खड़े करता है।भारत का संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गरिमा का अधिकार देता है। हिजाब पहनना या न पहनना किसी महिला का निजी और संवैधानिक अधिकार है। किसी सार्वजनिक मंच से, वह भी मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा, उस अधिकार में हस्तक्षेप करना स्वीकार्य नहीं ठहराया जा सकता-चाहे मंशा कुछ भी बताई जाए। सत्ता में बैठे लोगों की हर हरकत प्रतीकात्मक होती है और उसका संदेश दूर तक जाता है।राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि नीतीश कुमार स्वयं को लंबे समय से धर्मनिरपेक्ष और सुशासन का प्रतीक बताते रहे हैं। ऐसे में यह घटना उनके राजनीतिक चरित्र और सार्वजनिक छवि के लिए भी चुनौती बनकर सामने आई है। विपक्ष ने इसे अल्पसंख्यक समुदाय के अपमान और महिला विरोधी मानसिकता से जोड़ते हुए तीखा हमला बोला है, वहीं सत्तारूढ़ पक्ष इसे असावधानी या गलत व्याख्या करार देकर बचाव में जुटा है।
लेकिन सवाल यह नहीं है कि राजनीति को इससे कितना लाभ या नुकसान होगा। असली सवाल यह है कि क्या सत्ता संवेदनशीलता खोती जा रही है? क्या सार्वजनिक मंचों पर आचरण की मर्यादा अब गौण हो गई है? और क्या महिलाओं के सम्मान को लेकर अब भी हमें “इरादे” की सफाई देनी पड़ेगी? लोकतंत्र में नेतृत्व का अर्थ केवल निर्णय लेना नहीं, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करना भी होता है। एक छोटा-सा व्यवहार भी समाज को बड़ा संदेश देता है। इस प्रकरण ने समाज के एक बड़े हिस्से को आहत किया है और यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ऐसी घटनाओं से सबक लें।अंततः यह मामला किसी एक व्यक्ति, एक हिजाब या एक दल तक सीमित नहीं है। यह संविधान की आत्मा, महिला सम्मान और लोकतांत्रिक शिष्टाचार की परीक्षा है। राजनीति को चाहिए कि वह इस घटना को आरोप-प्रत्यारोप का हथियार बनाने के बजाय आत्ममंथन का अवसर माने। तभी लोकतंत्र मजबूत होगा और सत्ता के प्रति जनता का विश्वास बना रहेगा।

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