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77 साल का भारत: आंकड़ों मे विकास ,सवालों में लोकतंत्र

26 जनवरी को दिल्ली के कर्तव्यपथ पर जब परेड निकलती है, तो भारत एक सशक्त राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने खड़ा दिखता है.अनुशासन, हथियारों की ताकत, सांस्कृतिक झांकियाँ और राष्ट्रभक्ति से भरे भाषण—सब कुछ भव्य होता है. लेकिन गणतंत्र दिवस सिर्फ उत्सव का नहीं, आत्ममंथन का दिन भी है. 77 साल बाद सवाल यह है कि हमने संविधान से क्या पाया, रास्ते में क्या खोया और अब देश को किस दिशा में जाना चाहिए?आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। करीब 97 करोड़ मतदाता चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा हैं. देश की अर्थव्यवस्था दुनिया की शीर्ष पाँच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुकी है.डिजिटल इंडिया के तहत 130 करोड़ से अधिक आधार कार्ड, प्रतिदिन करोड़ों यूपीआई लेन-देन, और एक लाख से अधिक स्टार्टअप—ये आंकड़े बताते हैं कि भारत तकनीक और नवाचार में आगे बढ़ा है.
सड़क, बिजली, गैस और इंटरनेट की पहुँच गाँवों तक पहुँची—यह गणतंत्र की ठोस उपलब्धि है.लेकिन यही आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं दिखाते.सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, युवाओं में बेरोज़गारी दर कम नहीं हो रही. पढ़ा-लिखा युवा नौकरी की तलाश में हताश है.देश का स्वास्थ्य और शिक्षा पर सरकारी खर्च जीडीपी के अनुपात में अब भी कम है, जबकि यही क्षेत्र गणतंत्र की नींव मजबूत करते हैं.संसद के कामकाज पर नज़र डालें तो कई सत्रों में बहस का समय घटा और हंगामे का समय बढ़ा.लोकतंत्र की आत्मा—असहमति—पर दर्ज मामलों की बढ़ती संख्या बताती है कि सवाल पूछना अब जोखिम भरा होता जा रहा है. हमने क्या खोया हमने धीरे-धीरे संवैधानिक मर्यादाओं की संवेदनशीलता खोई.संस्थाएँ जो सत्ता पर निगरानी के लिए बनी थीं, उन पर भरोसा कम होता दिख रहा है.मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जनपक्षधर होने के बजाय सत्ता-पक्षधर नजर आता है.समाज संवाद से नहीं, ध्रुवीकरण से संचालित होने लगा है—नागरिक पहले समर्थक-विरोधी बनता है,फिर नागरिक बाद में।अब देश को और झांकियों की नहीं, जवाबदेही की राजनीति चाहिए.मजबूत नेतृत्व के साथ स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थाएँ चाहिए.राष्ट्रवाद को भाषणों और प्रतीकों से निकालकर रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय से जोड़ना होगा.और सबसे जरूरी—एक ऐसा नागरिक जो सिर्फ तालियाँ न बजाए, बल्कि सत्ता से सवाल भी पूछे.गणतंत्र दिवस पर तिरंगे को सलामी देना आसान है,लेकिन संविधान की आत्मा को रोज़मर्रा के जीवन में बचाए रखना कठिन.अगर विकास के आंकड़े चमकते रहें और लोकतंत्र की आवाज़ धीमी पड़ती जाए,तो समझ लेना चाहिए कि परेड तो चल रही है—पर गणतंत्र को सहारे की ज़रूरत है.क्योंकि लोकतंत्र झंडे से नहीं, जागरूक नागरिक से ज़िंदा रहता है.

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