
फजले हक़
विकास की असली पहचान यह नहीं कि कितने पुलों का शिलान्यास हुआ, बल्कि यह है कि उन पुलों के टूटने और बनने के बीच जनता कितनी सुरक्षित रही.दरभंगा के अलीनगर विधानसभा के तारडीह प्रखंड स्थिति लगमा पंचायत के बथई गांव में यह सवाल आज पूरी व्यवस्था के सामने खड़ा है.नई आरसीसी पुल बनाने के नाम पर पुरानी पुल तोड़ दी गई. लेकिन विडंबना देखिए कि पुल तोड़ने के बाद महीनों बीत गए, निर्माण कार्य शुरू तक नहीं हुआ. न मशीनों की आवाज़ सुनाई दी, न निर्माण की रफ्तार दिखाई दी. हां,एक काम जरूर तेजी से हुआ पुरानी पुल का करोड़ों रुपये का लोहे का ढांचा और अन्य सामग्री हटाकर ठेकेदार अपने साथ ले गया.यानी जनता का रास्ता बंद करने में फुर्ती दिखाई गई, लेकिन जनता के लिए वैकल्पिक रास्ता बनाने में नहीं.सवाल यह है कि क्या किसी भी निर्माण कार्य का पहला नियम यह नहीं होना चाहिए कि पहले वैकल्पिक आवागमन की व्यवस्था की जाए, फिर पुरानी संरचना हटाई जाए? अगर डायवर्सन बना दिया जाता तो गांव की जिंदगी सामान्य रहती. बच्चे स्कूल जाते, किसान बाजार पहुंचते, मरीज समय पर अस्पताल पहुंचते और लोगों को अपनी जान हथेली पर रखकर नदी पार नहीं करनी पड़ती.
लेकिन यहां तस्वीर उलटी है. ठेकेदार अपना काम निकालकर चला गया और ग्रामीणों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया.
सरकारी विभाग की चुप्पी भी कम हैरान करने वाली नहीं है. क्या किसी अधिकारी ने यह देखने की ज़रूरत नहीं समझी कि पुल टूटने के बाद हजारों लोगों का आवागमन कैसे होगा? क्या ठेकेदार को बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए पुल तोड़ने की अनुमति दी गई? अगर दी गई, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की अनदेखी है।आज गांव के बच्चे नदी पार कर पढ़ने जा रहे हैं. बुजुर्ग अस्पताल जाने के लिए 12 से 15 किलोमीटर अतिरिक्त सफर तय कर रहे हैं. किसान और मजदूर रोज़ परेशान हैं. लेकिन फाइलों में शायद सब कुछ संतोषजनक होगा.सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है. यदि पुल तोड़ने के बाद निर्माण शुरू नहीं होना था, तो फिर इतनी जल्दबाजी किस बात की थी? क्या ठेकेदार की सुविधा जनता की सुविधा से बड़ी हो गई? क्या करोड़ों रुपये की परियोजना में कुछ लाख रुपये का अस्थायी डायवर्सन बनाना इतना कठिन था?दुर्भाग्य यह है कि हमारे यहां विकास का अर्थ अक्सर यही रह गया है—बोर्ड लगा दो, पुल तोड़ दो, जनता को इंतजार करने दो.जब लोग सवाल पूछें तो कह दो कि काम प्रगति पर है.बथई गांव के लोग किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे. वे केवल इतना चाहते हैं कि जब तक नई पुल नहीं बनती, तब तक आने-जाने का सुरक्षित रास्ता दिया जाए. यह कोई एहसान नहीं, बल्कि सरकार और ठेकेदार दोनों की जिम्मेदारी है.
प्रशासन को तुरंत हस्तक्षेप कर निर्माण एजेंसी से जवाब मांगना चाहिए. या तो युद्धस्तर पर पुल निर्माण शुरू कराया जाए, या तत्काल अस्थायी डायवर्सन बनाकर आवागमन बहाल किया जाए. प्रखंड प्रसाशन की उदासीनता भी कई प्रश्न को उठा रहे हैं. सवाल उठता है की प्रखंड प्रशाशन को अपने ही क्षेत्र की जानकारी नहीं है की कैसे लोगों की जीवन बिना वेकल्पिक व्यवस्था किये पुल को तोड़ दिया गया
. प्रखंड शासन को पहल करनी चाहिए क्योंकि विकास का कोई भी मॉडल उस दिन असफल हो जाता है, जब जनता को अपने ही गांव में आने-जाने के लिए जान जोखिम में डालनी पड़े.पुल केवल लोहे और कंक्रीट से नहीं बनते, वे जिम्मेदारी से बनते हैं। और जहां जिम्मेदारी टूट जाती है, वहां पुल टूटने से पहले व्यवस्था ढह जाती है.




