
फजले हक
14 सितंबर आते ही हिंदी की अचानक किस्मत चमक जाती है.सरकारी दफ्तरों में हिंदी दिवस के बैनर लगते हैं. मंच सजते हैं. अधिकारी भाषण देते हैं. हिंदी की महानता पर बातें होती हैं. हिंदी के सम्मान की शपथ ली जाती है और तालियां बजती हैं.फिर कार्यक्रम खत्म.कुर्सियां अपनी जगह चली जाती हैं, माइक बंद हो जाता है और हिंदी भी शायद पूछती रह जाती है,अब मुझे कहां जाना है?15 सितंबर को वही कार्यालय, वही फाइलें,वही नोटशीट. वही अंग्रेजी के आदेश.यानी 14 सितंबर को हिंदी दिवस और 15 सितंबर से अगले साल तक हिंदी की छुट्टी.हिंदी को लेकर देश के अलग-अलग राज्यों में विवाद भी होते रहे हैं. खासकर दक्षिण भारत में हिंदी को थोपे जाने के विरोध की आवाजें उठती रही हैं. यह विरोध हमें समझना चाहिए. किसी भाषा को जबरन किसी पर लादना भाषा का सम्मान नहीं, भाषा को राजनीति का विषय बनाना है.लेकिन यहां एक दूसरा सवाल भी है.क्या हिंदी का राजनीतिक विरोध हिंदी के साहित्य, गीत और संस्कृति को खत्म कर सकता है?
क्या कोई आदेश प्रेमचंद की किताबों को लोगों की स्मृति से निकाल सकता है?क्या किसी विवाद से दिनकर, निराला, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन और नागार्जुन की रचनाओं का असर खत्म हो जाएगा?और उन गीतकारों का क्या, जिन्होंने हिंदी को किताबों से निकालकर करोड़ों लोगों की जुबान तक पहुंचाया?शैलेंद्र, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूंनी, आनंद बख्शी, गुलज़ार और जावेद अख्तर जैसे गीतकारों ने हिंदी फिल्मी गीतों के माध्यम से हिंदी के शब्दों को देश के कोने-कोने तक पहुंचाया.
लता मंगेशकर की आवाज हो या मोहम्मद रफी की—लोगों ने भाषा से पहले भावना सुनी.किसी ने रेडियो बंद करके यह नहीं कहा कि आज हिंदी का गीत है, इसलिए नहीं सुनेंगे.
यही हिंदी की असली ताकत है.हिंदी को किसी पर विजय हासिल करने की जरूरत नहीं. वह गीत बनकर दिल तक पहुंची, कविता बनकर मन तक पहुंची, कहानी बनकर समाज तक पहुंची और सिनेमा के माध्यम से देश के दूर-दराज इलाकों तक पहुंची.इसलिए हिंदी समर्थकों को भी एक बात समझनी होगी.हिंदी को महान बनाने के लिए तमिल को छोटा करने की जरूरत नहीं है.हिंदी को मजबूत करने के लिए मलयालम से लड़ने की जरूरत नहीं है.हिंदी का सम्मान करने के लिए दूसरी भारतीय भाषाओं का अपमान करने की जरूरत नहीं है.भारत की भाषाएं एक-दूसरे की दुश्मन नहीं हैं. असली समस्या तब पैदा होती है जब भाषा को संवाद की जगह सत्ता और पहचान की लड़ाई बना दिया जाता है.
और हिंदी दिवस मनाने वाले सरकारी कार्यालयों से भी एक छोटा-सा सवाल है.अगर हिंदी इतनी प्यारी है तो साल में केवल एक दिन क्यों?एक दिन हिंदी की आरती और बाकी साल अंग्रेजी की फाइलें—यह दोहरा चरित्र आखिर कब तक चलेगा?सबसे जरूरी—हिंदी को दूसरी भाषाओं से लड़ाकर नहीं, लोगों के दिल में जगह बनाकर आगे बढ़ाइए.
क्योंकि किसी भाषा को सरकारी आदेश से थोड़ी देर के लिए ऊपर रखा जा सकता है, लेकिन लोगों के दिल में जगह साहित्य, गीत, कविता और संवाद ही बनाते हैं.
इसलिए इस हिंदी दिवस पर एक सवाल बचा रह जाता है.
क्या हम हिंदी दिवस मना रहे हैं, या हिंदी को साल में एक दिन याद करके बाकी 364 दिन भूल जाने की रस्म निभा रहे हैं?अगर जवाब दूसरा है, तो अगले साल फिर बैनर लगा दीजिए.लेकिन इस बार बैनर के नीचे एक पंक्ति और लिख दीजिए.
“हिंदी दिवस समाप्त होने के बाद हिंदी कहां जाएगी?”




