
दरभंगा /तारडीह -प्रखंड के लगमा पंचायत स्थित बथेई गॉव मे पुल एवं सड़क निर्माण शिलान्यास के पत्थर पर धूल नहीं जमी, लेकिन जनता के पैरों में कीचड़ जरूर जम गया. 2024 को नेताओं ने मुस्कुराकर कहा था—पुल बनेगा. तालियां बजीं,लोग ख़ुश हुए,कैमरे चमके, अखबारों में तस्वीरें छपीं. ऐसा लगा मानो विकास खुद चलकर गांव आ गया हो.समय के साथ साथ फिर विकास शायद रास्ता भूल गया.पुल का निर्माण शुरू नहीं हुआ, लेकिन सबसे पहले पुराना लोहे का पुल तोड़ दिया गया. यानी पहले जनता का सहारा छीना गया, फिर उसे भगवान भरोसे छोड़ दिया गया.कमाल देखिए, ठेकेदार लोहे का पुल उखाड़कर ले गया. अभियंता देखते रहे. अधिकारी को भनक नहीं . विभाग चुप चाप देखता रहा. सरकार के दावे चलते रहे. और जनता? वह अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करती रही.ऐसा लग रहा था जैसे सरकार कह रही हो—पहले तैरना सीखो, फिर विकास मिलेगा.सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि पुल क्यों नहीं बना. सवाल यह है कि पुराना पुल तोड़ने की अनुमति किसने दी? बिना डायवर्जन, बिना वैकल्पिक व्यवस्था, बिना सुरक्षा के आखिर किस कानून के तहत लोगों की जान को दांव पर लगाया गया?जब मीडिया ने खबर दिखाई, जनता ने आवाज उठाई और सवाल उठने लगे, तब अचानक वर्षों से सोया हुआ तंत्र अंगड़ाई लेकर जाग गया. करोड़ों का आरसीसी पुल नहीं बना, लेकिन बांस की चचरी एक-दो दिन में खड़ी हो गई.वो भी चचरी नदी मे जलस्तर बढ़ने के साथ कोई उपयोग का नहीं.
वाह रे सिस्टम!जिस काम के लिए करोड़ रुपये चाहिए थे, उसकी जगह आखिर में बांस का पुल बन गया. तो फिर शिलान्यास करोड़ों का पुल का था या चचरी पुल का?
अगर बांस का पुल ही समाधान था, तो करोड़ों की योजना किसके लिए थी? जनता के लिए या सिर्फ शिलापट्ट और फोटो खिंचवाने के लिए?आज गांव वाले पूछ रहे हैं विकास का मतलब क्या सिर्फ पत्थर पर नाम लिखवाना रह गया है? दर्द इस बात का नहीं कि चचरी बनी. दर्द इस बात का है कि चचरी जनता ने मजबूरी में स्वीकार की, लेकिन विभाग और अधिकारी उसे अपनी उपलब्धि समझने लगी इस पूरे मामले में अगर केवल ठेकेदार दोषी है, तो अभियंता किसलिए हैं? अगर अभियंता निर्दोष हैं, तो अधिकारी किसलिए हैं? और अगर सब निर्दोष हैं, तो दोषी कौन है यह नदी?लोकतंत्र में जवाबदेही का पुल टूट जाए, तो फिर नदियां नहीं, व्यवस्था डुबोती है. सरकार अक्सर कहती है हम बिहार को आधुनिक बना रहे हैं.लेकिन यहां तस्वीर उल्टी है.घोषणा 21वीं सदी की,निगरानी 19वीं सदी की,
और सफर… बांस की चचरी पर। अब जनता को शिलान्यास नहीं, ऐसे लापरवाही बरतने वाले और लोगों परेशानी मे डालने वाले दोषी पर एफआईआर चाहिए.
और यदि करोड़ों की योजना के बाद भी जनता को बांस का पुल ही नसीब हो, तो यह विकास नहीं, व्यवस्था की सार्वजनिक विफलता है.जहाँ पुल से पहले फोटो बन जाए और पुल की जगह चचरी बन जाए, वहां सवाल सरकार से नहीं,पूरे प्रशासनिक चरित्र से पूछा जाना चाहिए.




